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Tuesday, 1 December 2020 - 12:54am

आदिवासी समाज में महिलाओं को मिलने वाले सम्मान की दरकार
‘‘यत्र नार्यस्तु पुजयन्ते तत्र रमन्ते देवता’’
नारी सम्मान के क्षेत्र में नकारात्मक सोच ने आदिवासी महिलाओं को काफी पीछे धकेलकर रख दिया है। इसके पीछे आदिकाल से अनेकानेक कारण रहे है। सर्वाधिक पिछड़ा, उपेक्षा, नारी तिरस्कार व साक्षरता की कमी यह तर्क अकाट्य है कि आदिवासी समाज तिरस्कृत व शोषित समुदाय के रूप में कछुए की चाल से अग्रसर है। अपने भरण-पोषण में उल्झा यह समाज ‘‘गरीब की जोरू सबकी भाभी’’ बनकर रह गया। राजनैतिक इच्छा शक्ति ने भी अद्यो गति की ओर ढ़केला है। महिलाओं के सम्मान को ईष्वर चन्द्र विद्यासागर, राजाराम मोहनराय महापुरूष द्वय ने अपने एतिहासिक कदम उठाकर प्राचीनतम परम्पराओं से उभारकर अंध विश्वास की अंधेरे से प्रकाष पूंज की ओर नवीन कदम उठाये। सती प्रथा का अन्त कर विधवा विवाह के लिए लम्बा संघर्ष किया। इस प्रयास से नारी सम्मान आंषिक परिवर्तन बाल-विवाह, विधवा-विवाह, सतीप्रथा, बहु-विवाह पर करारा घात कर आर्थिक सहायता दी गई। 4 दिसम्बर 1826 का दिन सती प्रथा का अन्तिम संस्कार कार महिलाओं को उपकृता किया। शनैः शनैः साक्षारता में भी अभिवृद्धि कर बालिका विद्यालयों की स्थापना की गई। जाति प्रथा भी स्त्री सम्मान में एक रोढ़ा व असन्तोष समाज में व्याप्त रहा। इसी समय आधूनिक लोकतंत्र के अभ्यूदयकाल में अस्पृश्यता के विरूद्ध आवाज उठाई गई जिससे महिला सम्मान की नई किरण दिखाई दी। समान अधिकारों व बिना जाति, धर्म, लिंग भेद के संघर्ष व विकास की स्वतंत्रता जारी हुई। आसपृश्यता उन्मूलन को गति देने के लिए बापू ने हरिजन-पत्र के माध्यम राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारों का प्रचार-प्रसार हुआ। इस आन्दोलन ने आदिवासी व दलित महिलाओं के सम्मान के प्रति अलख जगाया। बापू के कार्यकाल में महिलाओं के सम्मान में अनेक कानून बने 1989 में सामाजिक संरक्षण हैतू दलितों, आदिवासीयों पर अत्याचार उत्पीड़न निवारण की पहल की गई किन्तु नकारात्मक सोचने उत्पीड़न को कम नहीं होने दिया। 2005 में महिला अत्याचार निवारणार्थ प्रस्ताव पास किया किन्तु घरेलु अत्याचार पर अंकुश नही लगपाया नतिजन दिखावा मान रहा व देश के अनेक राज्यों में म.प्र., पश्मि-बंगाल, उ.प्र., बिहार, राजस्थान, दिल्ली में बलात्कार, लुटपाट, छेड़-छाड़ रोजमर्रा के जीवन में आम बात हो गई। ऐसे में आदिवासी महिलाओं का सम्मान बढ़ना कोरी कल्पना लगने लगी। दहेज हत्या निरोधक कानून 1961 में बनाया गया जिसका मकसद सामाजिक बुराइयों का अन्त करना था, लेकिन सम्मान पाना तो दूर उल्टे बहु-बेटियों की हत्याओं व जघन्य अपराधों में तब्दिली बहुतायतसी हो गई। आदिवासी समाज की महिलाओं को मिलने वाले सम्मान की कल्पना करना व्यर्थ ही निरूपित हो रही है। वजह अखिल भारतीय स्कुली शिक्षा सर्वे की 7वीं रिपोर्ट में 35 मिलियन बच्चे स्कूल द्वार से बाहर है। जबकि राजनैतिक इच्छा शक्ति सब पढ़े सब बढ़े 2010 मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा देने की घोषणा ने हमें झकजोर दिया है।
बाल-विवाह, दहेज प्रथा, बाल श्रमिकों पर रोक, कन्याभ्रूण हत्या जैसे अनेक अपराधों को जड़ से उखाड़ फेंकने के प्रयास किये गये व कानून बनाये गये पर कथनी व करनी की रवाई बढ़ती ही जा रही है। जब तक साक्षरता को शत् प्रतिशत लक्ष्य रेखांकित कर पूरजोर प्रयास नहीं होगें तक, सर्व शिक्षा अभियान, साक्षारता अभियान, पढ़ो कमाओं योजना, आदिम जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्यण विभाग अपने अधीनस्त आरक्षित जातियों की उपेक्षा के सिवाय जनकल्याण से कोसों दूर हो गया है। जलधारा, जीवन धारा, कपिल धारा, कृषि उपकरण अनुदान सहित हजम होते रहेगे। स्वच्छ भारत अभियान में शौचालय नहीं बन पाये हैं न बन पायेगे ग्रामीण आदिवासी महिलाएॅं खुले में शौचकर सम्मान से वन्छित ही रहेगी। आर्थिक तंगहाल जीवन को ढ़ोहती रहेगी। भेड़-बकरियों की भांति दहेज की भेंट चढ़कर सम्मान की मृगमरिचिका में भटकती रहेगी। समाज और राष्ट्र के लिए सुयोग्य व जुम्मेदार नागरिकों को महत्वपूर्ण योगदार देने के लिए हम सुसंगठित होकर अपने बने संगठन के माध्यम से समाज की महिलाओं को सम्मान देकर उपकृत करें क्योंकि हम देख चुके है कि राजनैतिक, आर्थिक स्थिति हमारी मनोभावना के अनुकुल नहीं है। बेटि बचाओ, बेटि पढ़ओ, मिल बाॅंचें ये सब दिवास्वप्न है।
यद्यपि हम सब एक ही मिट्टी के बने हैं। तथापि कुछ आदेश देते है और कुछ उसका पालन करते है। सलाह तो अनेक देते है किन्तु उससे लाभ उठाना बुद्धिमानों को ही आता है।
‘‘इस बात की कल्पना भी मत करो कि अवसर तुम्हारे द्वार पर आकर दुबारा पुकारेगा’’ हम सब मिलकर गुणात्मक शिक्षा द्वारा महिला जागृति के प्रेरणा स्त्रोत बने और सम्मान बढ़ायें। प्रबल इच्छा शक्ति से कुशल नेतृत्व कर्ता और जनप्रिय समाज सेवको तथा लोक हित में संस्थापित योजनाओं का सही मायनों में क्रियान्वयन कर महिलाओं के सम्मान में वृद्धि की आषा पूंज दिखाई दे सकती है। सही भी है बडवानी जिले के ग्राम सालीटांका के एक अकेले श्रद्धेय देमनिया भाई ने नेतृत्व कर 80 हजार लोगो को व्यसन मुक्त कर दिया फिर हम सामाजिक कार्यकताओं का संगठन पिछड़े क्यों है ?
‘‘साभार (लोक संवेदना दस्तक),रूमालसिंह वर्मा, ग्राम-ठान, जिला बड़वानी म.प्र.’’

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In krantikariyo ko marnoprant samman milna chahiye.

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