मुस्लिम समाज चिंतित, पुलिस की कार्रवाई पर : सवाल तरीके पर है, पूछताछ पर नहीं

रायपुर . राजधानी में आज 23/12/25 को पुलिस प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई ने पूरे मुस्लिम समाज को गहरी चिंता में डाल दिया है। एक बड़ी कार्रवाई के नाम पर सैंकड़ो मुस्लिम परिवारों के बुज़ुर्गों तथा समाज के उन लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिनकी छवि अब तक साफ़-सुथरी, प्रतिष्ठित और भरोसेमंद रही है। यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इन लोगों को हिरासत में लेने का ठोस और विधिसम्मत आधार क्या था। प्रशासन का कहना है कि कुछ लोगों पर संदेह है या उनसे पूछताछ की जानी है। पूछताछ करना कानून और व्यवस्था का हिस्सा है और समाज को इस पर कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन सवाल पूछताछ के अधिकार का नहीं, बल्कि उसे अपनाने के तरीके का है।*
जिस प्रकार से आधी रात महिलाओं को—वह भी बुज़ुर्ग महिलाओं को—और सत्तर वर्ष से अधिक आयु के बुज़ुर्गों को उनके घरों से उठाया गया, वह तरीका न केवल असंवेदनशील है, बल्कि एक सभ्य लोकतंत्र की भावना के भी विरुद्ध है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या पूछताछ के लिए नोटिस, समन या अन्य सम्मानजनक और कानूनी प्रक्रियाएँ उपलब्ध नहीं थीं?
इस पूरी कार्रवाई से ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम समाज की छवि को गलत तरीके से प्रस्तुत करने और भय का वातावरण निर्मित करने का प्रयास किया गया है। जब समाज के जिम्मेदार और सम्मानित नागरिकों के साथ इस तरह का व्यवहार किया जाता है, तो उसका प्रभाव केवल उन व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है।
मुस्लिम समाज कानून का सम्मान करता है और प्रशासनिक प्रक्रिया में सहयोग का पक्षधर रहा है। लेकिन किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वीकार्य नहीं हो सकता कि महिलाओं और बुज़ुर्गों को बिना पूर्व सूचना, बिना उचित प्रक्रिया के, डराने वाले तरीके से उनके घरों से उठाया जाए।
यह भी विचारणीय है कि यदि इसी प्रकार की कार्रवाई किसी अन्य समाज के साथ की जाती, तो वहाँ व्यापक और संगठित प्रतिक्रिया देखने को मिलती। यह तुलना किसी टकराव के उद्देश्य से नहीं, बल्कि यह रेखांकित करने के लिए है कि हर समाज को अपने सम्मान और संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजग और जागरूक रहना चाहिए।
*यदि आज इस प्रकार की कार्रवाइयों के खिलाफ संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से आवाज़ नहीं उठाई गई, तो आने वाले समय में यही तरीका सामान्य बना दिया जाएगा। फिर समाज को यह मानने के लिए मजबूर किया जाएगा कि अपमान और भय के साथ की गई कार्रवाई ही व्यवस्था का हिस्सा है।
*समाज की ओर से यह मांग की जाती है कि—
• इस पूरी कार्रवाई की निष्पक्ष और पारदर्शी समीक्षा की जाए।
• जिन लोगों को बिना ठोस कारण हिरासत में लिया गया है, उन्हें सम्मानपूर्वक राहत दी जाए।
• भविष्य में पूछताछ जैसी प्रक्रियाओं के लिए मानवीय, संवैधानिक और कानूनी तरीकों को अनिवार्य रूप से अपनाया जाए।
*यह आवाज़ किसी टकराव या विरोध के लिए नहीं, बल्कि न्याय, सम्मान और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए है। आज आवश्यकता है कि समाज अपने आपसी मतभेदों और नाइत्तिफ़ाक़ियों को भुलाकर एकजुट हो और संवैधानिक तरीके से पुरज़ोर आवाज़ उठाए—क्योंकि आज जो हो रहा है, कल वह किसी के साथ भी हो सकता है।
शहर सिरतुन्नबी कमेटी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *