उच्चतम न्यायालय ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी

Report by manisha yadav

नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को गाजियाबाद के एक युवक को जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी।


न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह फैसला सुनाया, जो न्यायालय के 2018 के ‘कॉमन कॉज’ निर्णय (जिसे 2023 में संशोधित किया गया था) पर आधारित है, जिसमें गरिमा के साथ मरने को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी थी।

हरीश राणा (31 वर्षीय) एक इमारत से गिरने के बाद से पिछले 13 वर्षों से चेतना-शून्य अवस्था में हैं। मस्तिष्क की चोट के कारण सभी अंग पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गये थे और वह ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (पीवीएस) की स्थिति में चले गये थे।

मेडिकल रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 13 वर्षों में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। वह केवल सर्जरी के माध्यम से लगाए गए पीईजी ट्यूबों द्वारा दिए जाने वाले चिकित्सकीय पोषण के सहारे जीवित हैं।

पीठ ने पिता की ओर से दायर उन आवेदनों पर यह आदेश पारित किया, जिसमें उन्होंने अपने बेटे को लगाये गये सभी जीवन रक्षक उपकरणों को हटाने की मांग की थी।

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