
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद के एक महत्वपूर्ण मामले में पत्नी की अपील खारिज करते हुए पति को दिया गया तलाक बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी का अलग घर में रहने की इच्छा जताना अपने आप में क्रूरता नहीं है, लेकिन यदि परिस्थितियों में पति के गंभीर रूप से बीमार माता-पिता से अलग होने के लिए लगातार और अनुचित दबाव बनाया जाए तथा ऐसा आचरण लंबे समय तक वैवाहिक जीवन को कठिन बना दे, तो यह मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है।जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने 18 अगस्त 2026 को दिए फैसले में डोंगरगढ़ के जिला न्यायालय द्वारा 11 नवंबर 2024 को दिए तलाक के आदेश को बरकरार रखा। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1) के तहत पत्नी के व्यवहार को मानसिक क्रूरता बताते हुए तलाक मांगा था।
शादी के बाद शुरू हुआ विवाद
दंपती का विवाह 8 मार्च 2007 को हुआ था। पति के अनुसार करीब डेढ़ वर्ष तक संबंध सामान्य रहे, इसके बाद पत्नी लगातार अलग घर में रहने का दबाव बनाने लगी। पति के पिता गंभीर हृदय रोग से पीड़ित थे और तीन बार उनकी हार्ट सर्जरी हो चुकी थी। पति ने कहा कि ऐसी स्थिति में वह अपने माता-पिता से अलग नहीं हो सकता था।
कोर्ट ने पाया कि पत्नी कई बार अपने बेटे को लेकर बिना सूचना मायके चली जाती थी और वहां उसका स्कूल में दाखिला भी करा दिया था। 6 सितंबर 2018 को दोनों परिवारों के बीच हुई बैठक में पत्नी ने माफी पत्र भी दिया था। पत्नी के भाई और मामा ने भी इस पत्र पर अपने हस्ताक्षर होने की पुष्टि की।
को बिना उचित कारण अपने माता-पिता से अलग होने के लिए लगातार मजबूर करना परिस्थितियों के आधार पर मानसिक क्रूरता हो सकता है। विवाह के बाद भी किसी व्यक्ति की वृद्ध या बीमार माता-पिता के प्रति पारिवारिक जिम्मेदारियां समाप्त नहीं हो जातीं।
