“Gangs of Raipur’ पलाश का वह मंच जहां सपनों ने उड़ान भरी
फिल्म में उनकी उपस्थिति सिर्फ एक किस्तार तक सीमित नहीं है यह उस संघर्ष, साहस और जुनून का प्रगाण है जो उन्होंने पिछले वर्षों में जिया है। रायपुर के एक सामान्य युवा से लेकर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने तक का सफर-पलाश साबित करते हैं कि
“किसी सपने को साकार करने के लिए बस एक साहसी कदम काफी होता है।”
युवाओं के लिए मिसाल: नौकरी छोड़ना जोखिम हो सकता है, पर जुनून शक्ति बन सकता है
पलाश की कहानी बताती है
सपने तब तक दम लेते हैं, जब तक आप उन्हें पूरा करने की हिम्मत नहीं जुटाते
रिजेक्शन अंत नहीं, तैयारी का हिस्सा है
करियर बदलना डरावना है, पर सफलता हमेशा कम्फर्ट ज़ोन के बाहर मिलती है
सपनों का रास्ता मुश्किल है, लेकिन मंज़िल इमेशा खूबसूरत होती है
आज पलाश न सिर्फ बड़े पर्दे पर हैं… बल्कि हजारों युवाओं को यह संदेश भी दे रहे हैं: “सपनों को मौका दो,
वे भी आपको गौका देंगे।
‘Gangs of Raipur’ में उजकी एंट्री केवल शुरुआत है। यह उस लंबे, रोमांचक और उम्मीदों से भरे सफर का पहला अध्याय है, जिसकी ओर पलाश जे हिम्मत, जुजूज और समर्पण से कदम बढ़ाया हौ
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रायपुर।
कभी ऑफिस की केबिन में बैठकर कॉफी के साथ ईमेल टाइप करने वाला एक युवा… आज कैमरे की तेज रोशनी के बीत अपने डायलॉग्स बोल रहा है। यह कहानी है पलाश श्रीवास्तव की उनकी, जिन्होंने कॉर्परिट करियर की सुरक्षित राह छोड़कर अपने असली सपनों की तरफ दौड़ लगाने का फैसला किया। और आज उसी निर्णय का परिणाग है उनकी फिल्म ‘Gangs of Raipur में शाजदार एंट्री।
कॉर्पोरेट लाइफ की दिनचर्या में दबा था बड़ा सपना
पलाश की जिंदगी कभी एवरोल शीट, गीटिंग्स और KPI की परिभाषा में बंधी हुई थी। सोगवार से शुक्रवार तक वही दौड़ डेडलाइंस, टारगेट्रा, और अंतहीन ऑफिस कॉल्स। पर भीतर कुछ और चल रहा था एक सपना, जो बचपल से पल रहा थाः बड़े पर्दे पर अभिनय करना
ऑफिस में वे भले मैनेजर की आवाज सुन रहे हों, पर दिमाग किसी किरदार के संवाद पर अटक जाता था। वीकेंड आता, और वे दूसरों की तरह आराम नहीं करते वह एक्टिंग सीखते, अभ्यास करते, खुद को निखारते। यह सिर्फ शौक नहीं था, यह उनकी पहचान थी।
वह दिन जब पलाश ने कहा- “अब मेरी कहानी मैं खुद लिखूंगा”
नौकरी छोड़ना आसाज नहीं था। अलग शहर, अस्थिर भविष्य, और अभिजय की अनिश्चित दुनिया… लेकिन पलाश ने डार जहीं माजी। उन्होंने वह फैसला किया, जिसे लोग सिर्फ सपनों में सोचते हैं
उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी को अलविदा कहकर फुल-टाइम एक्टिंग की राह पकड़ ली।
रायपुर से मुंबई तक का सफर सिर्फ दूरी नहीं, बल्कि संघषों की श्रृंखला थी रिजेक्शन, कठिन ऑडिशन, किराए की चिंता,
और लगातार खुद को बेहतर साबित करने का दबाव ।
लेकिन पलाश जाजते थे “सपना अपना है, लड़ाई भी अपनी होगी।”
और फिर आया वह कॉल… जिसने जिंदगी बदल दी
लगातार कोशिशों के बीच एक दिन फोन बजा यह कॉल था ‘Gangs of Raipur’ टीम की तरफ से।
पलाश को फिल्म में एक अहम भूमिका मिली।
सेट पर कदम रखाते ही उन्हें महसूस हुआ वही जगह, यही सपना, यही पहचाना
उनके अभिजय ने डायरेक्टर्स और टीम को प्रभावित किया। संवाद, अभिव्यक्ति, स्क्रीन प्रेजेंस हर जगह पलाश ने अपनी मेहनत का असर दिखा दिया।
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