अरावली की मैपिंग का आदेश, सर्वे ऑफ इंडिया को निर्देश

Report by manisha yadav

नई दिल्ली। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय (MoEF) द्वारा अरावली में खनन की अनुमति योग्य सीमा को और कम करने की घोषणा से ठीक पहले सर्वे ऑफ इंडिया को मैपिंग का आदेश दे दिया गया। अरावली की 100 मीटर की नई परिभाषा को लागू करने की दिशा में हो रहे विरोध के बीच यह मैपिंग महत्वपूर्ण है।

पर्यावरण मंत्रालय का सर्वे ऑफ इंडिया को दिया गया निर्देश 17 दिसंबर के एक कार्यालय ज्ञापन में निहित है, जो पर्यावरण सचिव की अध्यक्षता में 8 दिसंबर को हुई बैठक के बाद जारी किया गया था। इस बैठक का उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकृत परिभाषा को लागू करना था।

मिनट्स ऑफ मीटिंग ने में कहा गया है कि सर्वे ऑफ इंडिया, राज्य सरकारों के अनुरोध पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकृत अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा के अनुसार स्थलाकृति पर क्षेत्रों के अंकन और सीमांकन के लिए सभी आवश्यक सहायता प्रदान करेगा।

संकट की क्या है वजह

मंत्रालय के एक तकनीकी पैनल द्वारा प्रस्तावित और खनन के उद्देश्य से 20 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनाई गई परिभाषा, केवल सबसे निचले सीमा रेखा से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची भू-आकृति को अरावली पहाड़ी के रूप में मान्यता देती है, जबकि 500 ​​मीटर के भीतर की पहाड़ियों को एक ही पर्वत श्रृंखला के रूप में माना जाता है। इससे संरक्षण प्रयासों के कमजोर पड़ने की चिंता पैदा हो गई है क्योंकि अरावली पर्वतमाला, जो थार रेगिस्तान और उत्तरी मैदानों के बीच एक बाधा के रूप में कार्य करती है मुख्य रूप से निचले इलाकों में स्थित है

खनन प्रबंधन योजना की भी तैयारी

मंत्रालय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRI) के माध्यम से संपूर्ण अरावली क्षेत्र के लिए सतत खनन प्रबंधन योजना तैयार करने की प्रक्रिया में भी लगा हुआ है। योजना के अंतिम रूप दिए जाने तक कोई भी नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जा सकता है, जबकि मौजूदा परिचालन केवल न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति की सिफारिशों के अनुरूप ही जारी रह सकता है। 8 दिसंबर की बैठक के मिनट्स में यह भी दर्ज है कि जिलावार खनन योजनाएँ तभी तैयार की जा सकती हैं जब किसी पर्वत श्रृंखला को एक सिंगल जियोलॉजिकल सिस्टम के रूप में माना जाए ताकि “अरावली प्रणाली की निरंतरता और अखंडता को विधिवत बनाए रखा जा सके।

न्यायालय की मानें तो कम होगा अरावली का क्षेत्रफल

पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि न्यायालय के आदेशों को अपनाने से कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त पर्वत श्रृंखलाओं का क्षेत्रफल काफी कम हो जाएगा। अरावली विशेषज्ञ और दक्षिण हरियाणा के सेवानिवृत्त वन संरक्षक एमडी सिन्हा का कहना है की “स्थानीय भू-आकृति की कसौटी पर खरे उतरने वाली पहाड़ियाँ अरावली पर्वतमाला के 10 फीसदी से भी कम हो सकती हैं।”

क्या कहती है सरकार

मंत्रालय का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 100 मीटर की परिभाषा को अपनाने से खनन नियंत्रण में कोई ढील नहीं आती है। वर्तमान में अरावली क्षेत्र के 0.2 फीसदी हिस्से में खनन की अनुमति है।संयोगवश, MOEF के उस हलफनामे में, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 100 मीटर की परिभाषा को अपनाने के लिए भरोसा किया था, यह भी कहा गया था कि अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं को परिभाषित करने के लिए ऊंचाई और ढलान अपर्याप्त मापदंड हैं। हलफनामे में विविधतापूर्ण प्रकृति वाली एक विषम पर्वत श्रृंखला के लिए एक समान परिभाषा तैयार करने के प्रयास में उत्पन्न विरोधाभासों को रेखांकित किया गया है।

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