इंटरनेशनल मार्केट में चल रहे टर्नओवर के कारण चांदी के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन कीमतों का यही आसमान छूना इस इंडस्ट्री के मूल पर असर डालने लगा है। कीमतों में बढ़ोतरी के साथ ही मार्केट में चांदी के सामान की डिमांड नहीं है। इसलिए चांदी के कारीगरों के लिए भुखमरी की नौबत आ गई है। पिछले दिसंबर में चांदी का औसत दाम 70 हजार रुपये प्रति किलो था, जो इस दिसंबर में 2 लाख 41 हजार हो गया है। यानी दाम तीन गुना बढ़ गए हैं। चांदी महंगी होने के साथ ही गहनों के दाम भी बढ़ गए हैं। आम आदमी पांच लोड (50 ग्राम) का पायजन ज्यादा खरीदता है। पहले इसका दाम 5 हजार था, जो अब 15 हजार हो गया है। हर गहने के दाम में इतनी बढ़ोतरी होने के कारण शादियों का सीजन शुरू होने के बाद भी मार्केट से सामान की आवक नहीं हो रही है। इसलिए नई डिमांड नहीं है। नतीजतन काम ठप होने से कारीगरों ने दूसरे इंडस्ट्री में रोजगार तलाशना शुरू कर दिया है। हुपरी के सौ किलोमीटर के दायरे में औरतें घर से ही पजन बुनने का काम करती हैं।
कोल्हापुरजिले के हुपरी में चांदी का उद्योग महाराष्ट्र का प्रमुख हस्तशिल्प उद्योग है। हुपरी की तुलना सेलम, आगरा, राजकोट के चांदी उद्योगों से की जाती है। हर शहर की एक अलग पहचान है। इसी तरह, हुपरी अपनी चांदी की प्लेटिंग के लिए भी जाना जाता है। प्लेटिंग के साथ-साथ यहां मुख्य रूप से वाले, करदोड़े, जोड़वी, वेदनी, तोड़े आदि गहने बनाए जाते हैं।
यह सारा काम कला का काम है। एक प्लेटिंग बनाने में कम से कम 28 कारीगर लगते हैं। हुपरी और आस-पास के दस से बारह गांवों में करीब छह हजार चांदी के कारोबारी हैं। यहां से कुछ टन माल बनकर भारतीय और दुनिया के बाजारों में जाता है। इस इलाके में 40 हजार कामगार हैं। दो लाख लोगों की रोजी-रोटी इस उद्योग पर निर्भर करती है। उनके पास अब पर्याप्त काम नहीं है।
