Report by manisha yadav
संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ समाप्त हो गया। 20 जुलाई से शुरू हुए इस सत्र से देश को उम्मीद थी कि महंगाई, रोजगार, शिक्षा, पेपर लीक, कानून-व्यवस्था और अन्य जनहित के मुद्दों पर गंभीर बहस होगी। लेकिन सत्र का बड़ा हिस्सा सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच विरोध, नारेबाजी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में गुजर गया।
सरकार ने जहां 12 विधेयक पारित होने को सत्र की उपलब्धि बताया, वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण सवालों पर सरकार जवाब देने से बचती रही। नतीजा यह रहा कि संसद के दोनों सदनों में अपेक्षित स्तर की चर्चा नहीं हो सकी।
संसद में सबसे ज्यादा क्यों हुआ हंगामा?
मानसून सत्र की शुरुआत से ही छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई का मुद्दा विपक्ष के निशाने पर रहा। विपक्षी दलों ने इस मामले को लेकर केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय से जवाब मांगा।
इसके साथ ही राम मंदिर से जुड़े दान में कथित अनियमितता का मुद्दा भी संसद परिसर में प्रदर्शन का कारण बना। समाजवादी पार्टी समेत विपक्षी दलों ने इस मामले में सवाल उठाए और सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
सत्र के दौरान प्रमुख राजनीतिक मुद्दे रहे:
- छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई
- राम मंदिर दान से जुड़े कथित आरोप
- गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की मांग
- प्रधानमंत्री की संसद में उपस्थिति को लेकर विपक्ष के सवाल
- झारखंड में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई
- सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
राहुल गांधी और विपक्ष ने सरकार को घेरा
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने छात्र आंदोलन के मुद्दे पर सरकार पर लगातार हमला बोला। राहुल गांधी समेत विपक्ष के कई नेताओं ने पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की मांग की।
राहुल गांधी के कुछ बयानों को लेकर सत्ता पक्ष ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और भाजपा सांसदों ने आरोपों के प्रमाण सदन में रखने की मांग की।
इस पूरे विवाद के बीच संसद में चर्चा का माहौल लगातार प्रभावित होता रहा।
राम मंदिर दान का मुद्दा भी बना बड़ा विवाद
समाजवादी पार्टी के सांसदों ने राम मंदिर से जुड़े दान में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाया। अखिलेश यादव और डिंपल यादव समेत पार्टी के सांसदों ने संसद परिसर में प्रदर्शन किया।
विपक्ष का कहना था कि इस मामले में पारदर्शिता जरूरी है और सरकार को आरोपों पर जवाब देना चाहिए। सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश बताया।
इस मुद्दे पर भी संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक टकराव देखने को मिला।
अंतिम दिनों में भाजपा ने भी किया प्रदर्शन
सत्र समाप्त होने से पहले सत्ता पक्ष ने भी विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया। भाजपा ने राहुल गांधी और विपक्ष पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया।
सत्ता पक्ष ने झारखंड में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाते हुए सवाल किया कि विपक्ष अलग-अलग राज्यों में समान घटनाओं को लेकर अलग-अलग रुख क्यों अपनाता है।
इस तरह मानसून सत्र के अंतिम दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और बढ़ गया।
अमित शाह बोले- जवाब देने को तैयार
सत्र समाप्त होने से ठीक पहले गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष की लगातार जवाब की मांग पर कहा कि वह सदन में जवाब देने के लिए तैयार हैं, लेकिन विपक्ष को पहले सदन चलने देना चाहिए।
उनका कहना था कि हंगामे के कारण कार्यवाही बार-बार स्थगित होती रही, ऐसे में सरकार सदन में अपना पक्ष कैसे रखे।
विपक्ष की ओर से कहा गया कि उसे केवल भाषण नहीं, बल्कि उठाए गए सवालों का स्पष्ट जवाब चाहिए। दोनों पक्षों के बीच यह गतिरोध सत्र के अंतिम दिन तक बना रहा।
12 बिल पास, लेकिन चर्चा पर उठे सवाल
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार मानसून सत्र में कुल 12 विधेयक पारित हुए। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि बहस और चर्चा के नजरिए से सत्र उतना प्रभावी नहीं रहा।
सत्र के कामकाज से जुड़े प्रमुख आंकड़े:
- लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत रही।
- राज्यसभा की उत्पादकता करीब 39 प्रतिशत रही।
- कुल 12 विधेयक पारित किए गए।
- परीक्षाओं में अनुचित साधनों और पेपर लीक से संबंधित कानून पर दोनों सदनों में चर्चा हुई।
- कई अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तावित विधेयक चर्चा के अभाव में लंबित रहे या अपेक्षित तरीके से आगे नहीं बढ़ सके।
जनता से जुड़े मुद्दे कहां रह गए?
संसद लोकतंत्र का वह मंच है जहां सरकार से सवाल पूछे जाते हैं और कानूनों पर विस्तार से चर्चा होती है। विरोध प्रदर्शन और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन जब लगातार व्यवधान के कारण बहस ही प्रभावित होने लगे तो इसका सीधा असर संसदीय कामकाज पर पड़ता है।
मानसून सत्र में यही तस्वीर सबसे ज्यादा दिखाई दी। सरकार विपक्ष को कार्यवाही बाधित करने के लिए जिम्मेदार बताती रही, जबकि विपक्ष का आरोप रहा कि सरकार असहज सवालों का जवाब नहीं देना चाहती।
सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने
पूरे सत्र में दोनों पक्षों की रणनीति लगभग स्पष्ट रही। विपक्ष ने सरकार को घेरने के लिए आंदोलन और विरोध का रास्ता अपनाया, जबकि सत्ता पक्ष ने विपक्ष के रवैये को जनविरोधी और संसद की कार्यवाही में बाधा डालने वाला बताया।
विपक्ष की ओर से पलटवार करते हुए कहा गया कि सरकार लोकतांत्रिक सवालों से बच रही है और संसद को केवल विधेयक पारित करने का मंच समझ रही है।
मानसून सत्र ने छोड़ा बड़ा सवाल
13 अगस्त को संसद के दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ मानसून सत्र समाप्त हो गया। 12 विधेयकों का पारित होना सरकार के लिए उपलब्धि हो सकता है, लेकिन कम उत्पादकता और सीमित चर्चा ने संसदीय कामकाज पर सवाल भी खड़े किए हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संसद में सरकार और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई के बीच आम जनता के मुद्दों पर गंभीर और सार्थक बहस कब होगी?
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की अपनी जिम्मेदारी है। सरकार का दायित्व जवाब देना है तो विपक्ष का दायित्व सवाल उठाने के साथ सदन को चलने देने में सहयोग करना भी है। संसद तभी प्रभावी होगी, जब हंगामे से ऊपर उठकर बहस, जवाबदेही और जनहित को प्राथमिकता दी जाएगी।
