Report by manisha yadav
जबलपुर। चार दशक पहले बरगी बांध परियोजना के लिए अपना गांव छोड़कर विस्थापित हुए परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सड़क की समस्या से परेशान ग्रामीणों ने अब सरकारी मदद का इंतजार छोड़कर खुद ही रास्ता सुधारने की जिम्मेदारी उठा ली है।
जबलपुर जिले के शहपुरा जनपद के दुर्गानगर गांव में ग्रामीण रोज सुबह गैंती, फावड़ा और तसला लेकर सड़क पर पहुंच रहे हैं। कोई गड्ढे भर रहा है, तो कोई मुरम और पत्थर बिछाने में जुटा है। इस सामूहिक श्रमदान में गांव की महिलाएं और बच्चे भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
बारिश में दलदल बन जाती है दो किलोमीटर सड़क
दुर्गानगर गांव में करीब 100 परिवार और लगभग 1500 लोग रहते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक गांव की मुख्य सड़क बारिश शुरू होते ही दलदल में बदल जाती है।
करीब दो किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर जगह-जगह कीचड़ और गड्ढे हो जाते हैं। दोपहिया वाहन फंसने लगते हैं और कई बार पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।
इसका सबसे ज्यादा असर स्कूल जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों पर पड़ता है। गांव का संपर्क कई दिनों तक प्रभावित रहने की स्थिति भी बनती है।
अधिकारियों को आवेदन दिए, फिर ग्रामीणों ने खुद संभाला मोर्चा
ग्रामीण सोनू राजपूत के मुताबिक, सड़क निर्माण को लेकर कई बार अधिकारियों और प्रशासन को आवेदन दिया गया, लेकिन काम आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद गांव के लोगों ने मिलकर श्रमदान करने का फैसला किया।
ग्रामीण अपने स्तर पर मुरम और पत्थर जुटाकर सड़क पर डाल रहे हैं। उनका उद्देश्य फिलहाल रास्ते को इतना बेहतर बनाना है कि बारिश के दौरान गांव का संपर्क पूरी तरह न टूटे।
भीमा बाई के मुताबिक, गांव के कई लोग मजदूरी पर जाने से पहले रोज दो से तीन घंटे सड़क सुधारने में श्रमदान कर रहे हैं।
महिलाएं और बच्चे भी सड़क निर्माण में जुटे
दुर्गानगर में चल रहे इस अभियान की खास बात यह है कि इसमें पूरा गांव हिस्सा ले रहा है।
- पुरुष गैंती और फावड़े से सड़क सुधार रहे हैं।
- महिलाएं भी बराबरी से श्रमदान कर रही हैं।
- बच्चे मिट्टी और पत्थर पहुंचाने में मदद कर रहे हैं।
- ग्रामीण अपने खर्च से मुरम और पत्थर ला रहे हैं।
- मजदूरी पर जाने से पहले लोग सड़क के लिए समय दे रहे हैं।
खराब सड़क से स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की खराब स्थिति का असर केवल आवागमन पर नहीं पड़ता। बारिश के दौरान स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति में भी परेशानी बढ़ जाती है।
ग्रामीणों के अनुसार, कई बार एंबुलेंस और 108 जैसी आपातकालीन सेवाओं को गांव तक पहुंचने में मुश्किल होती है। गंभीर मरीजों को अस्पताल ले जाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
गर्भवती महिलाओं को भी परेशानी उठानी पड़ती है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रसव के समय अस्पताल पहुंचने में दिक्कत न हो, इसलिए कुछ महिलाओं को पहले ही दूसरे गांव में जाकर रुकना पड़ता है।
जिला पंचायत में तीन-चार बार उठ चुका है मुद्दा
जिला पंचायत सदस्य रामकुमार सैयाम ने बताया कि दुर्गानगर की सड़क का मुद्दा जिला पंचायत की बैठकों में तीन से चार बार उठाया गया है। उन्होंने सड़क निर्माण के लिए जिला पंचायत CEO को लिखित प्रस्ताव भी दिया है।
इसके बावजूद सड़क निर्माण का काम शुरू नहीं हो पाया।
वहीं बरगी विधायक नीरज सिंह ने ग्रामीणों की परेशानी को गंभीर बताते हुए अधिकारियों से चर्चा करने और सड़क निर्माण के लिए बजट का प्रावधान कराने की बात कही है।
40 साल बाद भी स्थायी समाधान का इंतजार
बरगी बांध परियोजना के कारण विस्थापन के करीब 40 साल बाद भी दुर्गानगर के ग्रामीण सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। फिलहाल ग्रामीणों ने अपने श्रम और संसाधनों से बारिश में रास्ता बंद होने से बचाने की कोशिश शुरू कर दी है।
गैंती-फावड़ा लेकर सड़क पर उतरे ग्रामीणों की यह तस्वीर अब एक बड़े सवाल की ओर ध्यान खींच रही है—क्या चार दशक बाद अब इस गांव को पक्की और स्थायी सड़क मिल पाएगी?
ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनके सामूहिक श्रमदान के बाद प्रशासन इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने की दिशा में कदम उठाएगा।
